JHARKHAND कभी हेमंत के ‘गुरु’ थे चंपाई सोरेन

एक बार टाटा को भी इनके सामने झुकना पड़ा; चरवाहे से CM बनने की कहानी
JHARKHAND 31 जनवरी 2024। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को ED ने हिरासत में ले लिया। गिरफ्तारी से पहले उन्हें राजभवन ले जाया गया, जहां हेमंत से इस्तीफा दे दिया। अब सवाल था कि CM की कुर्सी पर कौन बैठेगा?
हेमंत सोरेन चाहते थे कि उनकी पत्नी कल्पना सोरेन CM बनें, लेकिन हेमंत की बहन तैयार नहीं हुईं। झारखंड मुक्ति मोर्चा का एक धड़ा और कांग्रेस भी वंशवाद के आरोपों की वजह से कल्पना के नाम पर तैयार नहीं हुआ।
JHARKHAND इसके बाद हेमंत सोरेन की नजर अपने खास और पार्टी के वरिष्ठ नेता चंपाई सोरेन पर पड़ी। 1 फरवरी को ऐलान हुआ और 2 फरवरी को चंपाई ने झारखंड के 7वें मुख्यमंत्री के तौर पर पद की शपथ ली। 8 महीने में ही चंपाई ने JMM से इस्तीफा दे दिया और BJP का दामन थाम लिया।
आंगन में चंपा के पेड़ थे, इसलिए नाम पड़ा चंपाई

1 नवंबर 1956 को सरायकेला-खरसावां जिले के जिलिंगगोड़ा गांव में संथाल आदिवासी सोहराय पर्व की तैयारी कर रहे थे। ये संथालियों का प्रमुख त्योहार है। इसे चावल की फसल कटने के बाद मनाया जाता है। ये आदिवासियों की दिवाली जैसा पर्व है।
इसी दिन सिमल सोरेन के घर एक बच्चे का जन्म हुआ। पेशे से किसान सिमल ने अपने घर के आंगन में बहुत सारे चंपा के पेड़ लगा रखे थे। बेटे के पैदा होने की खबर सुनकर उन्होंने चंपा के कुछ फूल तोड़े और ग्राम देवता के स्थान पर उसे अर्पित करने चले गए। उन्होंने अपने बेटे का नाम भी चंपाई यानी चंपा के फूल रख दिया।
सिमल के परिवार से पहली बार कोई स्कूल गया। स्कूल से फ्री होने के बाद चंपाई खेतों पर जाते और अपने पिता की मदद करते। 12 साल का होते-होते उन्होंने खुद के बूते पर खेत जोतना शुरू कर दिया था। चंपाई चरवाहे थे। वे अपने जानवरों को चराने के लिए जंगल में ले जाते थे।
खेत जोतने वाला किसान का ये बेटा आगे चलकर झारखंड आंदोलन का बड़ा नेता और इसी राज्य का CM भी बना।
JHARKHAND जब चंपाई के आंदोलन से टाटा प्रशासन को झुकना पड़ा
ये वो समय था जब चंपाई गांव के नेता बन चुके थे। उनके गांव के 90% लोग सरायकेला-खरसावां जिले के जिलिंगगोड़ा से 12 किलोमीटर दूर टाटा स्टील में नौकरी करते थे। 1988 की बात है। टाटा स्टील में काम करने वाले कुछ लोग चंपाई के पास आए। उन्होंने बताया कि कैसे उनके साथ भेदभाव होता है। न ठीक से छुट्टी मिलती है और न इलाज की सुविधा।
चंपाई ने अगले दो से तीन साल तक अस्थायी कर्मचारियों के लिए आंदोलन किया। वे जगह-जगह नुक्कड़ नाटक और धरना-प्रदर्शन करते थे। जब लोगों ने देखा कि ये मजदूर के हितों की लड़ाई है जो एक ग्रामीण लड़ रहा है, तो वे भी इसमें शामिल होने लगे।
आंदोलन बढ़ने लगा और एक समय ये भी आया कि टाटा स्टील के गेट से न कोई अंदर आ रहा था, न बाहर जा रहा था। पुलिस ने लाठीचार्ज भी किया, लेकिन मजदूरों की एकता के आगे पुलिस की एक न चली। आखिरकार टाटा मैनेजमेंट को झुकना पड़ा और सभी 1600 मजदूरों को स्थायी किया गया।
JHARKHAND शिबू के ससुराल में कांग्रेस नेता ने कराई चंपाई से मुलाकात
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वरिष्ठ पत्रकार विनय पूर्ति बताते हैं कि गांव चांडिल शिबू सोरेन का ससुराल है। यहां के कांग्रेस नेता वैजनाथ सोरेन एक बार जिलिंगगोड़ा गांव पहुंचे। उन्होंने देखा कि चौपाल पर एक लड़के को कुछ लोग घेरकर सलाह-मशविरा कर रहे हैं। वैजनाथ ने पूछा- ये लड़का कौन है। ग्रामीणों ने कहा कि गांव का लड़का है, लेकिन तेज है।
वैजनाथ शिबू सोरेन के रिश्तेदार थे, इसलिए दोनों की मुलाकातें होती रहती थीं। ये वो समय था जब शिबू सोरेन झारखंड आंदोलन के लिए JMM का विस्तार कर रहे थे। एक बार वे चांडिल आए।
उन्होंने वैजनाथ से कहा कि तुम्हारे एरिया में हमें अपनी पार्टी बढ़ाना है, तुम कांग्रेस छोड़कर हमें जॉइन कर लो।
वैजनाथ शिबू का बहुत सम्मान करते थे। वे मना भी नहीं कर पा रहे थे और कांग्रेस भी नहीं छोड़ना चाहते थे। वे पसोपेश में थे। एक तरफ पार्टी दूसरी तरफ शिबू सोरेन जैसे रिश्तेदार।
वैजनाथ ने कहा मैं कांग्रेस नहीं छोड़ सकता, लेकिन आपकी पार्टी को यहां बढ़ाने वाला व्यक्ति आपको दे सकता हूं।
इसके बाद वैजनाथ सोरेन ने शिबू और चंपाई की मीटिंग फिक्स कराई। पहली ही मुलाकात में दोनों एक-दूसरे के फैन हो गए। इसके बाद चंपाई ने JMM जॉइन की और शिबू सोरेन के साथ हो लिए।
जुड़ावः हर गांववाले को आज भी देते हैं नया कपड़ा और गुड़
JHARKHAND में आदिवासी समुदाय मकर संक्रांति पर टुसू पर्व मनाता है। यह आदिवासियों के बड़े पर्वों में से एक है। इस पर्व पर चंपाई सोरेन अपने विधानसभा क्षेत्र के हर गांव के लोगों को ही नहीं, दूसरी विधानसभा के लोगों को भी उपहार देते हैं। इस पर्व पर चावल और गुड़ से एक मिठाई बनाई जाती है। हर साल चंपाई सोरेन लोगों को चावल, गुड़ और एक जोड़ी कपड़ा देते हैं।
करीब तीन दशक से चंपाई हर परिवार को उपहार देते हैं। गांववाले इस बात को लेकर कॉन्फिडेंट होते हैं कि भले ही पार्टी के काम से चंपाई दा बाहर हों, लेकिन साल में एक बार टुसू पर्व पर वो हमारे साथ ही होंगे।

वरिष्ठ पत्रकार सुधाकर बताते हैं कि जिस तरह राशन की दुकान पर लंबी कतारें लगी रहती हैं। उसी तरह से उपहार पाने के लिए इनके घर पर हजारों लोगों की कतार लगी रहती है। भले ही रात के दो बज जाएं, लेकिन चंपाई दा सभी को उपहार देते हैं। उनका हमेशा से लक्ष्य रहा है कि कोई ग्रामवासी टुसू पर्व के दिन पुराना कपड़ा न पहने।
मजदूरों से उनका जुड़ाव आज भी बरकरार है। 6 अक्टूबर 2024 को ब्लड शुगर संबंधी दिक्कतों के कारण चंपाई सोरेन को रात नौ बजे जमशेदपुर के टाटा मेन हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। खबर फैलते ही सैकड़ों मजदूर अस्पताल के बाहर जमा होने लगे। वे बस ये जानना चाहते थे कि ‘चंपाई दा’ कैसे हैं। अस्पताल प्रबंधन को बयान जारी करना पड़ा कि चंपाई दा ठीक हैं। इसके बाद भी मजदूर अस्पताल के आसपास ही डटे रहे।
